Sanvaad संवाद

Knowledge

The Bhagavad Gita श्रीमद्भगवद्गीता

A dialogue between Krishna and Arjuna on the battlefield of Kurukshetra, about fear, duty and how to live.

Before the great war of the Mahabharata, Arjuna sees his own teachers and family on the other side. He lays down his bow. Krishna, his charioteer and friend, answers his questions. That conversation is the Gita.

18chapters
~700verses
1conversation

Six ideas

कर्मयोग

Karma Yoga

Effort is yours; the result is not.

ज्ञानयोग

Jnana Yoga

You are more than your body and your moods.

भक्तियोग

Bhakti Yoga

Love, offered simply, is enough.

ध्यान

Dhyana

A restless mind can be trained.

स्थितप्रज्ञ

Sthitaprajna

Stay steady in success and failure.

स्वधर्म

Svadharma

Walk your own path, even imperfectly.

Well-known verses

Bhagavad Gita 2.47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

Your right is to your work alone, never to its results.

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों पर कभी नहीं। तुम कर्मफल को अपना प्रेरक कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

Bhagavad Gita 6.5

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

Lift yourself up by your own self; do not let yourself sink.

मनुष्य को अपने ही द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

Bhagavad Gita 9.26

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

A leaf, a flower, a fruit or water, offered with love, I accept.

जो कोई भक्ति से मुझे पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध मन वाले व्यक्ति द्वारा प्रेम से दी गई वह भेंट मैं स्वीकार करता हूँ।

Bhagavad Gita 18.63

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥

I have shared this wisdom with you. Reflect on it fully, then do as you choose.

इस प्रकार मैंने तुम्हें गुप्त से भी अधिक गुप्त ज्ञान बता दिया है। इस पर पूरी तरह विचार करके जैसा चाहो, वैसा करो।

18 chapters

01 Arjuna's Despairअर्जुनविषादयोग

Facing his own family in battle, Arjuna is overcome by grief and lays down his bow.

कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं और धृतराष्ट्र संजय से युद्धभूमि का हाल पूछते हैं। दुर्योधन द्रोणाचार्य के पास जाकर दोनों पक्षों के प्रमुख योद्धाओं का वर्णन करता है और शंखनाद से युद्ध का वातावरण बनता है। अर्जुन श्रीकृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाने को कहते हैं और वहाँ अपने ही गुरुओं, संबंधियों और मित्रों को देखकर करुणा और मोह से भर जाते हैं। वे युद्ध के दुष्परिणाम, कुल-नाश और पाप का तर्क देकर लड़ने से मना कर देते हैं। अंत में शोक से व्याकुल अर्जुन धनुष-बाण छोड़कर रथ में बैठ जाते हैं।

Bhagavad Gita 1.47

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥

Arjuna cast aside his bow and arrows and sank down in his chariot, overwhelmed by sorrow.

संजय ने कहा — युद्धभूमि में ऐसा कहकर शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष छोड़कर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।

02 The Path of Knowledgeसांख्ययोग

The Self is eternal; act without clinging to results, with a steady mind.

शोक में डूबे अर्जुन को श्रीकृष्ण पहले फटकारते हैं, और अर्जुन अपनी उलझन स्वीकार कर शिष्य के रूप में उनकी शरण लेते हैं। श्रीकृष्ण आत्मा के अजन्मा, अविनाशी और नित्य स्वरूप को समझाकर बताते हैं कि शरीर के नाश पर शोक करना उचित नहीं। फिर वे क्षत्रिय के स्वधर्म की दृष्टि से अर्जुन को कर्तव्य-पालन के लिए प्रेरित करते हैं। इसके बाद कर्मयोग का सिद्धांत आता है — कर्म में अधिकार है, फल में नहीं, और समत्व ही योग है। अंत में अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ — स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति — के लक्षण बताते हैं।

Bhagavad Gita 2.47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

Your right is to your work alone, never to its results.

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों पर कभी नहीं। तुम कर्मफल को अपना प्रेरक कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

03 The Path of Actionकर्मयोग

No one can live without acting, so act selflessly, as an offering.

अर्जुन पूछते हैं कि यदि ज्ञान श्रेष्ठ है तो उन्हें युद्ध जैसे कठोर कर्म में क्यों लगाया जा रहा है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कोई भी प्राणी कर्म किए बिना नहीं रह सकता, इसलिए आसक्ति छोड़कर, यज्ञ-भाव से—अर्थात स्वार्थ से ऊपर उठकर, ईश्वर को अर्पण के भाव से—अपना कर्तव्य करना ही श्रेष्ठ है। श्रेष्ठ लोगों का आचरण समाज के लिए उदाहरण बनता है, इसलिए ज्ञानी को भी लोक-कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए। अंत में वे बताते हैं कि रजोगुण से उत्पन्न काम और क्रोध ही मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं, जिन्हें इन्द्रियों, मन और बुद्धि पर संयम और आत्म-ज्ञान से जीतना चाहिए।

Bhagavad Gita 3.21

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

Whatever a great person does, others follow.

श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो मानक स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।

04 Knowledge and Actionज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Right understanding turns everyday work into something freeing.

श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह योग प्राचीन काल से परम्परा में चला आया है और लुप्त होने पर उन्होंने इसे फिर अर्जुन को बताया है। वे अपने अवतार का रहस्य समझाते हैं कि धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए वे युग-युग में प्रकट होते हैं। फिर वे कर्म, अकर्म और विकर्म का सूक्ष्म भेद बताते हैं और कहते हैं कि आसक्ति रहित कर्म बंधन नहीं बनता। अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन करके वे ज्ञान-यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं, और अंत में अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञान की तलवार से संशय काटकर योग में स्थित हो और कर्तव्य के लिए उठे।

Bhagavad Gita 4.7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥

Whenever goodness declines and wrong-doing rises, I bring myself forth.

हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

05 Renunciationकर्मसंन्यासयोग

Give up attachment, not action. The wise see all beings as equal.

अर्जुन पूछते हैं कि कर्म-संन्यास और कर्मयोग में कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि दोनों कल्याणकारी हैं और एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं, पर कर्मयोग अधिक सुगम और श्रेष्ठ है, क्योंकि उसके बिना सच्चा संन्यास कठिन है। सच्चा संन्यासी वह है जो राग-द्वेष से मुक्त होकर, कर्म ब्रह्म को अर्पित करके, कमल के पत्ते की तरह संसार में अलिप्त रहता है। ज्ञानी सबमें समान दृष्टि रखता है, बाहरी सुखों के बजाय भीतर के सुख में स्थित रहता है और काम-क्रोध के आवेग पर नियंत्रण रखता है। अध्याय ध्यान की संक्षिप्त विधि के साथ समाप्त होता है, जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें सब यज्ञों का भोक्ता, सब लोकों का स्वामी और सबका सुहृद जानने से शांति मिलती है।

Bhagavad Gita 5.18

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥

The wise see all beings with an equal eye.

ज्ञानी लोग विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और कुत्ते का मांस खाने वाले चाण्डाल में भी समान दृष्टि रखते हैं।

06 Meditationआत्मसंयमयोग

Lift yourself by your own effort; practice steadies even a restless mind.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य करने वाला ही सच्चा संन्यासी और योगी है। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु है, इसलिए उसे अपने मन को जीतकर अपना उद्धार करना चाहिए। ध्यान की विधि—आसन, मुद्रा, एकाग्रता—और संतुलित आहार-विहार का महत्व समझाया गया है। अर्जुन मन की चंचलता पर संदेह करता है, तो भगवान अभ्यास और वैराग्य को उपाय बताते हैं। अंत में वे आश्वस्त करते हैं कि कल्याण के मार्ग पर चलने वाले का प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता, और कहते हैं कि जो श्रद्धा से 'मुझमें' मन लगाकर भजता है, वह योगियों में सबसे श्रेष्ठ है।

Bhagavad Gita 6.5

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

Lift yourself up by your own self; do not let yourself sink.

मनुष्य को अपने ही द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

07 Knowledge and Realisationज्ञानविज्ञानयोग

The divine holds everything together, like a thread through pearls.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने समग्र स्वरूप का ज्ञान अनुभव-सहित देते हैं। वे बताते हैं कि उनकी दो प्रकृतियाँ हैं—आठ प्रकार की जड़ प्रकृति और चेतन जीव-रूप उच्च प्रकृति—और सारा जगत उनमें धागे में मणियों की तरह पिरोया है। जल के रस से लेकर मनुष्य के पुरुषार्थ तक, हर वस्तु के सार में वही विद्यमान हैं। तीन गुणों की माया से मोहित होकर लोग उन्हें नहीं पहचानते, पर उनकी शरण में आने वाले इसे पार कर जाते हैं। चार प्रकार के भक्तों में ज्ञानी भक्त को श्रेष्ठ बताया गया है, और अंत में आठवें अध्याय के विषयों की भूमिका रखी गई है।

Bhagavad Gita 7.7

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥

All this is strung on me like pearls on a thread.

हे धनंजय, मुझसे परे और कुछ भी नहीं है। यह सारा जगत मुझमें उसी प्रकार पिरोया हुआ है जैसे धागे में मणियों के समूह।

08 The Imperishableअक्षरब्रह्मयोग

What we hold in mind through life shapes who we become.

इस अध्याय में अर्जुन ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ और अंतकाल में ईश्वर-स्मरण के बारे में प्रश्न पूछता है, और श्रीकृष्ण इन सबका उत्तर देते हैं। वे बताते हैं कि मृत्यु के समय व्यक्ति जिस भाव का स्मरण करता है, उसी को प्राप्त होता है, इसलिए हर समय ईश्वर का स्मरण करते हुए कर्तव्य करना चाहिए। ब्रह्मा के दिन-रात और सृष्टि-प्रलय के चक्र का वर्णन करते हुए वे उस सनातन, अविनाशी अव्यक्त पद को परम गति बताते हैं, जो अनन्य भक्ति से मिलता है। अंत में प्रकाश और अंधकार के दो मार्गों का वर्णन कर वे अर्जुन को सदा योगयुक्त रहने का उपदेश देते हैं।

Bhagavad Gita 8.7

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥

At all times remember me, and do your duty.

इसलिए तुम हर समय मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करके तुम निस्संदेह मुझे ही प्राप्त होगे।

09 The Royal Knowledgeराजविद्याराजगुह्ययोग

Even a leaf or a little water, offered with love, is enough.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को सबसे गूढ़ और श्रेष्ठ ज्ञान बताते हैं, जिसे वे 'राजविद्या' और 'राजगुह्य' कहते हैं। वे समझाते हैं कि पूरा जगत उन्हीं से व्याप्त है, फिर भी वे उससे बँधे नहीं हैं, और प्रकृति उन्हीं की अध्यक्षता में सृष्टि और प्रलय करती है। भोग की कामना से किए गए कर्मकांड अस्थायी फल देते हैं, जबकि श्रीकृष्ण वचन देते हैं कि अनन्य भाव से भजने वालों का योगक्षेम वे स्वयं वहन करते हैं। प्रेम से अर्पित एक पत्ता या जल भी उन्हें स्वीकार है, और हर कर्म उन्हें अर्पित करने से मनुष्य कर्म-बंधन से मुक्त होता है। भगवान सबके प्रति समान हैं और किसी भी पृष्ठभूमि का व्यक्ति भक्ति से परम गति पा सकता है।

Bhagavad Gita 9.26

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

A leaf, a flower, a fruit or water, offered with love, I accept.

जो कोई भक्ति से मुझे पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध मन वाले व्यक्ति द्वारा प्रेम से दी गई वह भेंट मैं स्वीकार करता हूँ।

10 Divine Gloriesविभूतियोग

Whatever is excellent and beautiful is a spark of the divine.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे ही देवताओं, ऋषियों और समस्त प्राणियों के मूल कारण हैं, और बुद्धि, क्षमा, सत्य जैसे सब भाव उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। जो भक्त प्रेम से उनमें मन लगाते हैं, उनके हृदय में स्थित होकर वे ज्ञान के दीपक से अज्ञान का अंधकार मिटाते हैं। अर्जुन उनकी स्तुति करके पूछते हैं कि किन-किन रूपों में उनका चिंतन करें। उत्तर में श्रीकृष्ण प्रकृति, देवताओं, ऋषियों, पशुओं, गुणों और मनुष्यों में अपनी प्रमुख विभूतियाँ गिनाते हैं। अंत में वे बताते हैं कि जहाँ भी विशेष तेज या महिमा है, वह उनका ही अंश है, और पूरा जगत उनके एक अंश मात्र में स्थित है।

Bhagavad Gita 10.20

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥

I am the Self in the heart of all beings.

हे गुडाकेश! मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। मैं ही सब प्राणियों का आदि, मध्य और अंत भी हूँ।

11 The Universal Formविश्वरूपदर्शनयोग

Arjuna is shown the whole universe, and time itself, in one form.

इस अध्याय में अर्जुन, विभूतियों का वर्णन सुनने के बाद, श्रीकृष्ण के ईश्वरीय रूप को प्रत्यक्ष देखने की इच्छा प्रकट करते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि देकर अपना विश्वरूप दिखाते हैं, जिसमें पूरा ब्रह्मांड, सब देवता और हज़ार सूर्यों जैसा तेज एक साथ दिखाई देता है। अर्जुन उसमें कौरव-पक्ष के योद्धाओं को काल के मुख में जाते देखकर भयभीत हो जाते हैं, तब श्रीकृष्ण स्वयं को 'काल' बताकर अर्जुन को केवल निमित्त बनकर कर्तव्य निभाने का आदेश देते हैं। अर्जुन स्तुति करते हैं, अपनी पिछली अनौपचारिकता के लिए क्षमा माँगते हैं और सौम्य रूप दिखाने की प्रार्थना करते हैं। अंत में श्रीकृष्ण बताते हैं कि ऐसा दर्शन वेद, तप, दान या यज्ञ से नहीं, अनन्य भक्ति से संभव है।

Bhagavad Gita 11.32

श्री भगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥

I am time, the great destroyer of worlds.

श्रीभगवान बोले: मैं लोकों का नाश करने वाला, बढ़ा हुआ काल हूँ, और यहाँ इन लोगों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ। तुम्हारे (युद्ध) किए बिना भी विरोधी सेनाओं में खड़े ये सब योद्धा नहीं बचेंगे।

12 Devotionभक्तियोगः

The one who is kind, forgiving and free of hatred is dear to Krishna.

इस अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि साकार भगवान की उपासना करने वाले श्रेष्ठ हैं या निराकार अक्षर ब्रह्म की साधना करने वाले। श्रीकृष्ण बताते हैं कि मन को उनमें लगाकर श्रद्धा से भजने वाले उत्तम योगी हैं, और निराकार के उपासक भी उन्हें ही प्राप्त होते हैं, पर देहधारियों के लिए वह मार्ग अधिक कठिन है। फिर वे क्रमशः सरल होते उपाय बताते हैं — मन को स्थिर करना, अभ्यास, उनके लिए कर्म करना और अंत में कर्मफल का त्याग। अध्याय के अंत में वे अपने प्रिय भक्त के लक्षण गिनाते हैं: द्वेष-रहितता, करुणा, समता, संतोष, क्षमा और निंदा-प्रशंसा में एक-सा रहना।

Bhagavad Gita 12.13

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

One who hates no being, who is friendly and compassionate, is dear to me.

जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समान रहता है और क्षमाशील है —

13 The Field and its Knowerक्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः

The body is the field; the awareness that knows it is the knower.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण शरीर को 'क्षेत्र' (खेत) और उसे जानने वाली चेतना को 'क्षेत्रज्ञ' कहकर दोनों का भेद समझाते हैं, और बताते हैं कि सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ वे स्वयं हैं। वे क्षेत्र के घटक तत्वों, सच्चे ज्ञान के बीस लक्षणों (जैसे विनम्रता, अहिंसा, क्षमा, वैराग्य) और जानने योग्य अनादि परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन करते हैं। फिर प्रकृति और पुरुष का संबंध बताते हैं — कर्म प्रकृति करती है, जबकि सुख-दुःख का अनुभव पुरुष करता है। जो सब प्राणियों में एक ही परमेश्वर को समान रूप से स्थित देखता है और आत्मा को अकर्ता जानता है, वही सच्चा देखने वाला है और परम गति पाता है।

Bhagavad Gita 13.2

श्री भगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥

This body is called the field, and the one who knows it, the knower of the field.

श्रीभगवान ने कहा: हे कौन्तेय, यह शरीर 'क्षेत्र' कहलाता है, और जो इसे जानता है, उसे तत्त्व के जानकार 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं।

14 The Three Qualitiesगुणत्रयविभागयोगः

Clarity, restlessness and inertia shape us, and one can rise above all three.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण प्रकृति के तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — का विस्तार से वर्णन करते हैं, जो आत्मा को शरीर से बाँधते हैं। सत्त्व ज्ञान और सुख से, रज इच्छा और कर्म की आसक्ति से, तथा तम अज्ञान, आलस्य और प्रमाद से बाँधता है। वे बताते हैं कि ये गुण एक-दूसरे को दबाकर बारी-बारी से प्रबल होते हैं, और मृत्यु के समय प्रबल गुण के अनुसार आगे की गति होती है। अर्जुन के पूछने पर वे गुणातीत व्यक्ति के लक्षण बताते हैं — जो सुख-दुःख, मान-अपमान, मित्र-शत्रु में सम रहता है — और कहते हैं कि उनकी अटल भक्ति से मनुष्य तीनों गुणों को पार कर ब्रह्म-भाव को प्राप्त होता है, क्योंकि वे स्वयं को ब्रह्म की प्रतिष्ठा बताते हैं।

Bhagavad Gita 14.5

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥

Sattva, rajas and tamas, born of nature, bind the soul within the body.

हे महाबाहु, सत्त्व, रज और तम — ये प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण अविनाशी आत्मा (देही) को शरीर में बाँध देते हैं।

15 The Supreme Personपुरुषोत्तमयोगः

Cut through attachment and know the Self beyond all change.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण संसार को एक उलटे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूप में चित्रित करते हैं, जिसकी जड़ ऊपर (परमात्मा में) और शाखाएँ नीचे फैली हैं, और बताते हैं कि अनासक्ति के दृढ़ शस्त्र से इसे काटकर उस परम पद को खोजना चाहिए जहाँ से लौटना नहीं होता। वे कहते हैं कि जीवात्मा उनका ही सनातन अंश है, जो एक शरीर से दूसरे शरीर में इंद्रियों और मन को साथ ले जाता है। सूर्य, चंद्रमा और अग्नि का तेज, पृथ्वी को धारण करने वाली शक्ति, पाचन की अग्नि और हृदय में स्थित स्मृति-ज्ञान — सब उन्हीं से हैं। अंत में वे क्षर (नश्वर), अक्षर (अविनाशी) और इन दोनों से परे पुरुषोत्तम का भेद बताते हैं, और कहते हैं कि जो उन्हें पुरुषोत्तम जानता है वह सब कुछ जानता है।

Bhagavad Gita 15.7

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

An eternal part of me becomes the living soul in this world.

इस जीव-लोक में सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है। वही प्रकृति में स्थित मन और पाँच इंद्रियों को अपनी ओर खींचता है।

16 Two Naturesदैवासुरसम्पद्विभागयोगः

Desire, anger and greed are the three gates to self-destruction.

इस अध्याय में श्रीकृष्ण मनुष्य के दो प्रकार के स्वभाव — दैवी और आसुरी संपदा — का भेद बताते हैं। निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धि, दान, संयम, अहिंसा, सत्य, क्षमा और करुणा जैसे गुण दैवी संपदा हैं जो मुक्ति की ओर ले जाते हैं, जबकि दंभ, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान आसुरी संपदा हैं जो बंधन में डालते हैं। वे आसुरी स्वभाव वाले लोगों की सोच — असीम कामनाएँ, अन्याय से धन-संग्रह और 'मैं ही सब कुछ हूँ' का अहंकार — का विस्तार से चित्रण करते हैं। अंत में वे काम, क्रोध और लोभ को नरक के तीन द्वार बताकर उन्हें त्यागने का उपदेश देते हैं, और कहते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका निर्णय शास्त्र को प्रमाण मानकर करना चाहिए।

Bhagavad Gita 16.21

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

Desire, anger and greed are the three gates to self-destruction.

काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

17 Three Kinds of Faithश्रद्धात्रयविभागयोगः

Food, speech and giving reflect the kind of faith we live by.

इस अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्र की विधि छोड़कर श्रद्धा से पूजा करते हैं, उनकी स्थिति कैसी है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार सात्त्विक, राजस या तामस होती है और मनुष्य वैसा ही बन जाता है जैसी उसकी श्रद्धा होती है। फिर वे भोजन, यज्ञ, तप और दान के तीन-तीन भेद समझाते हैं, और शरीर, वाणी तथा मन के तप का वर्णन करते हैं। अंत में ॐ तत् सत् के अर्थ को समझाकर बताते हैं कि बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी कर्म न इस लोक में फल देता है, न परलोक में।

Bhagavad Gita 17.15

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

Speech that is truthful, kind and causes no distress is the discipline of speech.

जो वाणी किसी को उद्विग्न न करे, जो सच्ची हो, प्रिय हो और हितकारी हो, तथा नियमित स्वाध्याय का अभ्यास — इन्हें वाणी का तप कहा जाता है।

18 Freedomमोक्षसंन्यासयोगः

Reflect on it all, then choose. Arjuna, his doubts cleared, rises to act.

अंतिम अध्याय में अर्जुन संन्यास और त्याग का भेद पूछते हैं, और श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा त्याग कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि आसक्ति और फल की इच्छा छोड़ना है। वे कर्म के पाँच कारण बताकर कर्तापन के अहंकार को ढीला करते हैं, और ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति तथा सुख के सात्त्विक, राजस और तामस भेद समझाते हैं। फिर स्वभाव के अनुसार कर्म करने और अपने कर्म से ही ईश्वर की पूजा करने को सिद्धि का मार्ग बताते हैं। अंत में वे पूर्ण शरणागति का परम उपदेश देते हैं; अर्जुन का मोह नष्ट होता है और वे कर्तव्य के लिए तैयार होते हैं, तथा संजय इस संवाद की महिमा गाते हुए गीता का समापन करते हैं।

Bhagavad Gita 18.63

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥

I have shared this wisdom with you. Reflect on it fully, then do as you choose.

इस प्रकार मैंने तुम्हें गुप्त से भी अधिक गुप्त ज्ञान बता दिया है। इस पर पूरी तरह विचार करके जैसा चाहो, वैसा करो।

Sanskrit from the public-domain text. Hindi and English written for Sanvaad with AI help, for knowledge only. Spotted a mistake? support@kolabx.com